सुशासन 2.0 : शिकायतों का डिजिटल समाधान
देश में डिजिटल शिकायत निवारण के कई मॉडल हैं, लेकिन बिहार का 'सहयोग पोर्टल' अधिक एकीकृत, जवाबदेह और तकनीक-संचालित व्यवस्था के साथ नई पहचान बना रहा है। सुशासन 2.0 के दौर में यह पहल डिजिटल गवर्नेंस की नई मिसाल बनकर उभर रही है।
अब सरकारों का मूल्यांकन केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी किया जा रहा है कि वे नागरिकों की शिकायतों को कितनी तेजी, पारदर्शिता और प्रभावशीलता से सुनती तथा उनका समाधान करती हैं। पिछले एक दशक में डिजिटल तकनीक ने देश में लोक शिकायत निवारण व्यवस्था का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है। केंद्र सरकार के केंद्रीय लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) पर हर वर्ष लाखों शिकायतें दर्ज हो रही हैं। प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 में केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के स्तर पर 1,76,719 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 1,78,423 शिकायतों का निस्तारण किया गया। वहीं राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में इसी अवधि के दौरान 85,900 शिकायतें प्राप्त हुईं और 84,365 शिकायतों का निपटान किया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब नागरिकों और प्रशासन के बीच जवाबदेह एवं पारदर्शी संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुके हैं।
इस दौरान राज्यों ने अलग से अपने लोक शिकायत निवारण मॉडल विकसित किए हैं। उत्तर प्रदेश का जनसुनवाई-समाधान पोर्टल, मध्य प्रदेश की सीएम हेल्पलाइन, राजस्थान का जनसुनवाई पोर्टल, केरल की ई-डिस्ट्रिक्ट व्यवस्था और आंध्र प्रदेश की स्पंदना जैसी प्रणालियां देश में डिजिटल गवर्नेंस के महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरी हैं। इसी क्रम में अब बिहार सरकार ने सहयोग पोर्टल के जरिए इन सभी मॉडलों से आगे बढ़कर एक अधिक एकीकृत और जवाबदेह व्यवस्था तैयार की है।
बात करें राज्यों के लोक शिकायत मॉडलों की तो उत्तर प्रदेश का जनसुनवाई-समाधान पोर्टल देश के सबसे सक्रिय शिकायत प्लेटफॉर्मों में शुमार है। भारत सरकार के प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) की मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, केवल एक महीने में उत्तर प्रदेश ने 27,030 शिकायतों का निस्तारण किया, जो सभी राज्यों में सर्वाधिक रहा। इसकी कार्यप्रणाली पूरी तरह डिजिटल मॉनिटरिंग पर आधारित है। शिकायत दर्ज होते ही वह संबंधित विभाग तक पहुंच जाती है और उसके निस्तारण की समय-सीमा निर्धारित कर दी जाती है। जिलों और विभागों की रैंकिंग भी शिकायत निस्तारण के प्रदर्शन के आधार पर तय की जाती है। हाल के वर्षों में अनेक जिलों ने शिकायत समाधान में उच्च संतुष्टि दर दर्ज की है, जिससे यह व्यवस्था डिजिटल गवर्नेंस के प्रभावी मॉडलों में शामिल हो गई है।
मध्य प्रदेश की सीएम हेल्पलाइन 181 को भी देश के चर्चित नागरिक फीडबैक आधारित मॉडलों में माना जाता है। इसकी खासियत है कि शिकायत बंद करने से पहले शिकायतकर्ता से पूछा जाता है कि वह समाधान से संतुष्ट है या नहीं। यदि शिकायतकर्ता असंतुष्ट है, तो मामला दोबारा खोला जा सकता है। इस मॉडल ने प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत किया है। बिजली, स्वास्थ्य, पंचायत और राजस्व विभागों से जुड़ी शिकायतें इसमें सबसे अधिक आती रही हैं। अलबत्ता शिकायतों की बड़ी संख्या और बहुस्तरीय प्रक्रिया के कारण समाधान में देरी भी इसकी प्रमुख चुनौती रही है।
राजस्थान सरकार का जनसुनवाई पोर्टल पंचायत स्तर तक पहुंच बनाने के लिए जाना जाता है। राज्य सरकार ने इसे ई-मित्र केंद्रों से जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में सुलभ बनाने का प्रयास किया। यहां केवल शिकायतें ही नहीं, बल्कि सुझाव और जनहित से जुड़े आवेदन भी दिए जा सकते हैं। जिला कलेक्टर स्तर पर इसकी नियमित समीक्षा होती है। हालंकि विभागीय समन्वय की कमी और इंटरनेट पहुंच की समस्या कई बार इसके प्रभाव को सीमित कर देती है। केरल का मॉडल तकनीकी रूप से काफी सशक्त है। वहां ई-डिस्ट्रिक्ट और स्थानीय निकाय आधारित डिजिटल सेवाओं के जरिए शिकायत और सेवा वितरण को एकीकृत किया गया है। आंध्र प्रदेश की स्पंदना और तेलंगाना की प्रजावाणी प्रणाली ने शिकायत निवारण को नियमित प्रशासनिक समीक्षा से जोड़ा है। इन राज्यों ने यह दिखाया कि तकनीक तभी सफल होती है जब उसके साथ प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक इच्छाशक्ति जुड़ी हो।
इन सभी मॉडलों के बीच बिहार का सहयोग पोर्टल इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि यह केवल शिकायत दर्ज करने का मंच नहीं, बल्कि एक व्यापक गुड गवर्नेंस इकोसिस्टम के रूप में विकसित किया गया है। बिहार पहले ही लोक सेवा अधिकार अधिनियम (आरटीपीएस), जनता दरबार और ऑनलाइन सेवा वितरण जैसे प्रयोगों के जरिए प्रशासनिक सुधार की दिशा में कार्य करता रहा है। सहयोग पोर्टल उसी प्रक्रिया का अगला और अधिक उन्नत चरण है। इस पोर्टल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुस्तरीय जवाबदेही प्रणाली है। शिकायत दर्ज होते ही उसकी डिजिटल ट्रैकिंग शुरू और प्रत्येक स्तर पर अधिकारी की जिम्मेदारी तय हो जाती है। यदि तय समय-सीमा में समाधान नहीं होता तो मामला स्वतः उच्च स्तर तक पहुंच सकता है। यह व्यवस्था कई अन्य राज्यों की तुलना में अधिक मजबूत एस्केलेशन मैकेनिज्म प्रदान करती है। बिहार सरकार इसे विभागीय डेटा, प्रदर्शन मूल्यांकन और प्रशासनिक मॉनिटरिंग से भी जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यह भी कि ज्यादातर राज्यों में शिकायत पोर्टलों का उपयोग अपेक्षाकृत शहरी और तकनीकी रूप से सक्षम वर्ग तक सीमित रहा है, जबकि बिहार का प्रयास इसे गांवों तक ले जाने का है।
राज्य और केंद्र के स्तर पर किए गए ऐसे तमाम प्रयासों का एक अनुभव यह भी रहा है कि किसी भी शिकायत निवारण प्रणाली की सफलता केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि उसकी निरंतर मॉनिटरिंग और प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। दिसंबर 2025 की DARPG रिपोर्ट के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 1.72 लाख शिकायतें लंबित थीं। यह दर्शाता है कि डिजिटल व्यवस्था के विस्तार के बावजूद समयबद्ध निस्तारण अभी भी बड़ी प्रशासनिक चुनौती बना हुआ है।
इन तमाम प्रयासों और अनुभवों के बीच जो बात अहम है, वह यह कि सत्ता और राजनीति की आपाधापी के बीच भारत में लोक शिकायत निवारण जिस तरह सुशासन का केंद्रीय आधार बना है, वह प्रशंसनीय है। इसका ही नतीजा है कि इस क्षेत्र में आगे कदम बढ़ाते हुए जहां उत्तर प्रदेश ने बड़े पैमाने की डिजिटल मॉनिटरिंग दिखाई और मध्य प्रदेश ने नागरिक फीडबैक को प्राथमिकता दी, वहीं केरल ने विकेंद्रीकरण का सफल मॉडल बनाया और राजस्थान ने पंचायत स्तर तक पहुंच सुनिश्चित करने की कोशिश की है। इस कड़ी में बिहार के सहयोग पोर्टल ने तमाम अनुभवों को समाहित करते हुए अधिक एकीकृत, डेटा आधारित और जवाबदेह मॉडल बनने की संभावनाओं पर खरा उतरने के सुनिश्चय के साथ लांच हुआ है। कह सकते हैं कि सुशासन 2.0 जिस तरह जिम्मेदार और पारदर्शी व्यवस्था का पर्याय बनता रहा है, वह लोक कल्याणकारी सरोकारों पर खरा उतरने की भारतीय लोकतंत्र की मूल प्रतिबद्धता को दिखाता है।